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गाणपत्य मत के प्रमाण

गाणपत्य मत की ऐतिहासिकता और शास्त्रीय प्रामाणिकता को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए, यहाँ वेदों, न्याय-वैशेषिक दर्शन, समस्त प्रमुख महापुराणों तथा विभिन्न आगम व तंत्र ग्रंथों से प्रामाणिक संस्कृत श्लोक, उनके सटीक संदर्भ और अर्थ एक साथ संकलित हैं: --- १. वेदों और उपनिषदों में प्रमाण वैदिक संहिताओं और उपनिषदों में गणपति को ब्रह्मांड के मूल तत्व और सर्वोच्च शासक (ब्रह्मणस्पति) के रूप में स्वीकार किया गया है। अ) ऋग्वेद (मण्डल २, सूक्त २३, मंत्र १) गाणपत्य मत का यह सबसे प्राचीन और अचूक मूल प्रमाण है: “गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणाम् ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिःसीदसादनम्॥” अर्थ: हे गणों के स्वामी (गणपति)! आप ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं। आप वेदों और प्रार्थनाओं के अधिपति हैं। हमारी प्रार्थना सुनकर अपनी रक्षा शक्तियों के साथ इस यज्ञ आसन पर विराजें। ब) यजुर्वेद (तैत्तिरीय आरण्यक - नारायण उपनिषद) वैदिक काल में गणेश गायत्री का प्रयोग उनकी सर्वोच्च ब्रह्म सत्ता को दर्शाता है: “तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥” अर्थ: हम ...

वीरशैव के इतिहास संक्षिप्त

क्या वीरशैव और लिंगायत एक ही हैं? — शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक प्रमाण आज सामान्य बोलचाल में "वीरशैव" और "लिंगायत" शब्दों का एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। किन्तु अनेक विद्वान, मठ तथा ऐतिहासिक स्रोत दोनों में भेद भी बताते हैं। यह विषय आज भी चर्चा का विषय है, इसलिए निष्पक्ष रूप से शास्त्रीय और ऐतिहासिक प्रमाणों को देखना आवश्यक है। 1. वीरशैव परंपरा का शास्त्रीय आधार वीरशैव परंपरा स्वयं को प्राचीन शैव परंपरा मानती है तथा निम्नलिखित शास्त्रों को प्रमाण मानती है— - वेद - उपनिषद् - शैव आगम - शिवपुराण - लिंगपुराण - न्याय दर्शन - वैशेषिक दर्शन - पंचाचार्य परंपरा (क) वैदिक प्रमाण तैत्तिरीय संहिता (श्रीरुद्रम 4.5.8) «नमः शिवाय च शिवतराय च।» यह पंचाक्षरी "नमः शिवाय" का वैदिक आधार माना जाता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.2 «एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।» अर्थ — केवल एक ही रुद्र है, उसके समान दूसरा कोई नहीं। (ख) पुराण प्रमाण लिंगपुराण «लिङ्गार्चनात् परो धर्मो न भूतो न भविष्यति।» अर्थ — लिंग की आराधना से बढ़कर कोई धर्म न हुआ है और न होगा। शिवपुराण «शिव एव परं ब्रह्...

पशुपत मत का इतिहास

पाशुपत सम्प्रदाय का इतिहास: इसकी शुरुआत किसने की और कैसे हुई? (वेद, उपनिषद, पुराण और ऐतिहासिक प्रमाण सहित) पाशुपत सम्प्रदाय सनातन धर्म की सबसे प्राचीन शैव परम्पराओं में से एक है। इसका आधार भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप पर है। 'पशु' का अर्थ केवल पशु-प्राणी नहीं, बल्कि कर्म, अविद्या और माया के बंधन में बंधे सभी जीव हैं, और 'पति' का अर्थ उनके स्वामी, रक्षक तथा मुक्तिदाता है। इसलिए भगवान शिव को पशुपति कहा जाता है। इसका सबसे प्राचीन प्रमाण यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (तैत्तिरीय संहिता 4.5.1) में मिलता है— «नमो भवाय च रुद्राय च। नमः शर्वाय च पशुपतये च॥» अर्थ: भव, रुद्र, शर्व तथा समस्त जीवों के स्वामी पशुपति को नमस्कार। यह सिद्ध करता है कि 'पशुपति' नाम किसी बाद की कल्पना नहीं, बल्कि वैदिक काल से भगवान रुद्र का प्रतिष्ठित नाम है। अथर्वशिरस उपनिषद में भगवान रुद्र स्वयं बताते हैं कि जो जीव पाश (अविद्या, कर्म और माया) में बंधा है वह 'पशु' है और जो उसे इन बंधनों से मुक्त करता है वही पशुपति है। इसी उपनिषद से पाशुपत दर्शन की मूल दार्शनिक अवधारणा स्पष्ट होती है। बाद ...

क्या पशुपत काल्पनिक हैं

क्या भगवान शिव का 'पशुपति' स्वरूप काल्पनिक है? जानिए वेदों, उपनिषदों, महाभारत, पुराणों, पुरातत्त्व और पाशुपत दर्शन के प्रमाण  आज के आधुनिक युग में अनेक लोग भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप को केवल एक पौराणिक कल्पना या प्रतीकात्मक कथा मान लेते हैं, किन्तु भारतीय धार्मिक परंपरा, वैदिक साहित्य, पुराण, महाकाव्य और पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि 'पशुपति' की अवधारणा अत्यन्त प्राचीन है और सनातन परंपरा में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। 'पशुपति' शब्द 'पशु' और 'पति' से मिलकर बना है। वैदिक और शैव परंपरा में 'पशु' का अर्थ केवल पशु-प्राणी नहीं, बल्कि बंधनों में बंधे सभी जीव भी माना गया है, जबकि 'पति' का अर्थ उनके स्वामी, रक्षक और मुक्तिदाता से है। इस प्रकार पशुपति वह हैं जो समस्त प्राणियों तथा बंधनग्रस्त जीवों के अधिपति हैं। इस स्वरूप का उल्लेख वैदिक साहित्य में भी मिलता है। यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (नमकम्) में प्रसिद्ध मंत्र "नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च" आता है, जिसमें रुद्र को 'पशुपति...

बैबल एवं हिन्दू धर्म वेद निन्दा का दंड

ईसाई जो वेद का खण्डन करते हैं उसके साथ क्या होगा इस के दो तथ्य के आधार पर पेश करेंगे  बैबल एवं हिन्दू  बैबल में कहा हैं कि उनको बहुत रवरव नरक मिलेगा यहां पर ये स्पष्ट तोर पर कहा हैं कि वेद भी परमेश्वर का वचन हैं क्योंकि  रोमन 1:20 में कहा गया है:   "परमेश्वर की अनदेखी सृष्टि से ही उसके नित्य सामर्थ्य और देवत्व को समझा जा सकता है"  यहाँ "अनदेखी सृष्टि" से तात्पर्य है वेदों में वर्णित सृष्टि के नियम और परमेश्वर की महिमा को दर्शाता हैं। कुलुस्सियों 2:8  में कहा गया है:  "किसी को दर्शनशास्त्र और व्यर्थ धोखे से न बहकाए, जो मनुष्यों की परंपरा और संसार की मूल तत्वों पर आधारित हैं, न कि मसीह पर"  यहाँ "मनुष्यों की परंपरा" के अलावा अन्य ज्ञान को भी परमेश्वर का ज्ञान माना गया है, जिसमें वेद भी शामिल हैं। हिन्दू धर्म में गरूड पुराण में लिखा हैं उन्हें कलपक नरक मिलता हैं जहां उनके प्रत्येक अंगों को यमदूत नोच नोचकर अलग-अलग करेंगे। भाई, बाइबिल में भी ऐसे लोगों के लिए दंड वर्णित हैं: बाइबिल के अनुसार: 1. अनन्त आग में डाला जाना - मत्ती 25:41 2. अन्धकार में ड...

महिषासुर के साथ विष्णु तथा भगवान शिव के युद्ध

महिषासुर के साथ विष्णु तथा भगवान शिव के युद्ध महिषासुर एक प्रलयंकर दानव था उन्होंने यह वर पालकर रखा था हमारे मृत्यु किसी प्रकार के जीव अस्त्र से हमारे मृत्यु नहीं अमर होने के अर्थ यह नहीं हैं मृत्यु ना हो बहुत काल तक हमें संकट ना हो  अब पहले भगवान विष्णु तत्क्षण युद्ध क्षेत्र में आये और महिषासुर से युद्ध करने लगे अनेक प्रकार के अस्त्र एवं शास्त्रों से पर्वत के समान विसाल वस्तुओं से युद्ध हुआ तदन्तर विष्णु भगवान अपने गदा से असुर के शिर पर प्रहार कि और असुर मुर्छित हो गया तब असुर सेना हाहाकार मचा गया। यहां पुराण के कथा में भयानक रस हैं अर्थात यहां यह करने का अर्थ हैं हम भगवान के भक्ति से बड़े से बड़े भयानक संगत में भी खड़े हो सकते हैं। यहां भगवान भक्ति कि महत्व समझाया गया हैं। आगे वह दानव आपने भक्ति के बल से खड़ा हो गया और एक परिध लेकर असुर ने भगवान विष्णु पर असुर प्रहार किया इससे विष्णु भगवान मुर्छित हो गये तत्क्षण गरुड ने विष्णु भगवान को मुर्छित देखकर उन्हें युद्ध स्थल से दुर लेकर चला गया।तब देवता लोग भयभीत हो गए तब उनके भय को देखकर करुण भाव में शंकर भगवान वहां आये भगवान शिव कि भाय...

हनुमान

आर्य समाज खण्डन आक्षेप  शिव पुराण शतरुद्र संहिता  मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को पैदा किया – [वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15] मरुत वायु/हवा का पुत्र है और आपको बता दूं पार्वती बी हनुमान को अपना पुत्तर कहती है, अब सोचने वाली बात ये है हनुमान अंजना और हवा के बेटे मरूत का पुत्र है तो पार्वती का पुत्र कैसे हुआ.. 🤔 खण्डन  चक्रे स्वं क्षुभितं शम्भुः कामबाणहतो यथा। स्वं वीर्यमपतयामास रामकार्यार्थमीश्वरः॥ 4॥ उस भगवान विष्णु प्रकृति रूप के मोहिनी देखते ही मन में अविद्या वृत्ति भेद न्याय से अपने आपको कामबाण से अर्थात इच्छा में विक्षुब्ध कर लिए कैसे इच्छा अर्थात प्रकृति तत्वों में परिवर्तन करने कि इच्छा से भगवान राम जी कार्य हेतु अपने आत्मा से जो कि सत्य है उससे एक सत्य अर्थात तेज को उत्सर्जन कर लिया  तद्वीर्यं स्थापयामासुः पत्रे सप्तर्षयश्च ते। प्रेरणा मनसा तेन रामकार्यार्थमादरात्॥ 5॥ उस तेज‌ अर्थात अग्नि सोमात्मक रुप को सप्त ऋषियों ने एक भगवान शिव जी के इच्छा से एक पत्र में अर्थात राक्षा करने वाले आधार में स्थापित कि इस अग्नि सोमात्मक से जैविक तत्वों के निर्माण हुआ जैसे...

Scientific view of lord shiva

 This my new approach to purans please understand over puran as science. If you like share like and comment. Thank you Greetings to the Supreme God Sadashiva, the limitless Entity harnessing His tripartite might to enact creation, sustenance, and dissolution – the concealed Essence permeating all life forms, the imperceptible orchestrator of all phenomena. 1. Lord Shiva's might, galaxies birthed and spread,  Lord Shiva's might, galaxies birthed and spread Certainly, from a scientific standpoint, the poem could be interpreted as describing the immense power of natural forces that led to the birth and expansion of galaxies. The mention of "Lord Shiva's might" might symbolize the fundamental physical and cosmic processes that triggered the universe's creation and subsequent development. Galaxies being "birthed and spread" could represent the formation and expansion of cosmic structures driven by processes such as cosmic inflation, gravitational attracti...

परशुराम तथा हैहेय वंश

 क्या भगवान परशुराम सब क्षत्रिय को खत्म किये थे 1 ये उन दिनो कि बात है जब भारत में हैहाया का अधिपति इनके २१ शाखा थे इनका संक्षिप्त वर्णण करते हैं। विस्तार जानकारी केलिए भागवत भागवत पुराण नवम स्कन्ध पढ सकते हैं हैहय वंश का वर्णन एक बार लीलामय भगवान् विष्णु अपनी प्रिया लक्ष्मी से हास-परिहास की वार्ता कर रहे थे। किसी बात पर वह गम्भीर हो गए। उन्होंने लक्ष्मी को मृत्युलोक में जाकर घोड़ी का जन्म लेने का शाप दे दिया। नारायण की लीला बड़ी रहस्यमय होती है। लीला के पीछे कोई न कोई उद्देश्य निहित रहता है । शाप से लक्ष्मी जी को अत्यन्त क्लेश हुआ । वह नारायण को प्रणाम करके चल दीं। जहां पर सूर्य पत्नी ने प्राचीन काल में अश्विनी (घोड़ी) के रूप में अत्यन्त कठिन तप किया था, वहीं पर भगवती लक्ष्मी घोड़ी का रूप धारण करके रहने लगी। फिर उन्होंने एकाग्रचित होकर भगवान् शिव की प्रसन्नता के लिये घोर तप प्रारम्भ कर दिया, एक सहस्त्र देव वर्ष उन्होंने घोर तप किया। तदुपरान्त आशुतोष भगवान् शंकर प्रसन्न होकर पार्वती समेत नन्दीगण पर सवार होकर प्रकट हो गए। दिव्य दर्शन करके अश्विनी लक्ष्मी मन ही मन उसकी स्तुति करने लग...

ಹರಿಹರ ಅಭೇದ

 ಹರಿಹರ ಅಭೇದ  ಭಗವಾನ್‌ ನಾರಾಯಣನು ತನ್ನ ದಿವ್ಯ ವೈಕುಂಠದಲ್ಲಿ ನಿದ್ರಿಸುತ್ತಿದ್ದಾಗ  ಕೋಟಿಕೋಟಿ ಚಂದ್ರರ ಕಾಂತಿಯಿಂದ ಯುಕ್ತನೂ, ತ್ರಿಶೂಲ, ಡಮರು  ಧಾರಿಯೂ ಸ್ವರ್ಣಾಭೂಷಣಗಳಿಂದ ವಿಭೂಷಿತನೂ ಸುರೇಂದ್ರವಂದಿತನೂ  ಅಣಿಮಾದಿ ಸಿದ್ದಿಗಳಿಂದ ಸುಸೇವಿವತನೂ ಆದ ತ್ರಿಲೋಚನ ಭಗವಾನ್‌ ಶಿವನು  ನೃತ್ಯ ಮಾಡತೊಡಗಿದ್ದನ್ನು ಸ್ವಪ್ನದಲ್ಲಿ ಕಂಡನು. ಆಗ ಅವನು ಎಚ್ಚತ್ತು, ಭಗವತಿ  ಲಕ್ಷ್ಮೀದೇವಿಗೆ ಈ ಸಂಗತಿಯನ್ನು ತಿಳಿಸಿ, ತನ್ನ ಸ್ಮರಣೆ ಮಾಡುತ್ತಿರುವ ಕೈಲಾಸ ಪತಿಯನ್ನು ಭೆಟ್ಟಿಯಾಗಬೇಕೆಂಬ ಇಚ್ಛೆಯಿಂದ ಕೈಲಾಸಕ್ಕೆ ಪತ್ನೀಸಹಿತನಾಗಿ  ತೆರಳಿದನು. ಆಗ ಅವನಿಗೆ ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿಯೆ ಭಗವಾನ್‌ ಚಂದ್ರಶೇಖರನು ಭಗವತಿ  ಉಮಾದೇವಿಯೊಡನೆ ದರ್ಶನ ಕೊಟ್ಟನು. ಶಿವನ ಸ್ವಪ್ನದಲ್ಲಿ ಭಗವಾನ್‌ ವಿಷ್ಣುವು  ದರ್ಶನ ಕೊಟ್ಟದ್ದರಿಂದ ಅವನು ವಿಷ್ಣುವಿನ ಭೆಟ್ಟಿಗಾಗಿ ಕೈಲಾಸದಿಂದ ವೈಕುಂಠಕ್ಕೆ  ಹೊರಟನು. ಅವರಿಬ್ಬರೂ ಆನಂದದಿಂದ ಮಾತಾಡತೊಡಗಿದರು. ಇಬ್ಬರೂ  ತಮ್ಮ ತಮ್ಮ ಸ್ವಪ್ನದ ಸಂಗತಿಯನ್ನು ತಿಳಿಸಿದರು. ಇಬ್ಬರ ನೇತ್ರಗಳಲ್ಲಿಯೂ  ಆನಂದಾಶ್ರುಗಳು ಹರಿಯತೊಡಗಿದವು. ಆಗ ಪರಸ್ಪರರು ತಮ್ಮ ಲೋಕಕ್ಕೆ  ಬರಬೇಕೆಂದು ಆಗ್ರಹದಿಂದ ಹೇಳತೊಡಗಿದರು. ಅವರ ಸಂಭಾಷಣೆಯನ್ನು ಕೇಳಿ  ಭಗವತಿ ಉಮಾದೇವಿಯು ಉಭಯತರನ್ನುದ್ದೇಶಿಸಿ ಮಾತಾಡತೊಡಗಿದಳು :  "ನಾಥಾ, ಕೇಶವಾ, ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರ ನಿಶ್ಚಲ ಪ್ರೇಮವ...

वेदों में गणपति भगवान भाग-०१

वेदों में गणेश भगवान  हमारे हिन्दू धर्म का रोचक तथ्य है कि पांच देवताओं को परब्रह्म परमात्मा मानें जाते हैं। इनमें से शिव , गणपति, देवी, सुर्य और विष्णु मुख्य हैं। कोई भी पुजा वा देवकार्य में अग्र पुजा के अधिकारी  कौन हैं उस देव का वैदिक महत्व क्या हैं भगवान आदि शंकराचार्य पंचायतन पुजा पद्धति का प्ररम्भ किये थे। इसका चित्र समेत डाल दिया हुं  गणेश परब्रह्म का प्रयोग वेद में वृहस्पति का अर्थ में होते हैं बृहस्पति शब्द का उत्पत्ति इस प्रकार होता हैं। बृहत्या वाचः पतिः बृहस्पति होता हैं अब गणेश ही क्यों गणेश ज्ञान का भगवान् हैं अतः बृहत अर्थात महान वाच अर्थात मंत्र उसके पति रक्षक गणेश भगवान हैं । आचार्य सायण जी भी अपने भाष्य में ब्रह्मण का अर्थ मंत्र करते हैं इसलिए मंत्र का रक्षा करने वाले परब्रह्म परमात्मा ही महागणपति हैं। यहां वाच शब्द का अर्थ उच्यतेऽसौ अनया वा वच होता हैं अब मीमांसा दर्शन में कर्म को ही परब्रह्म मानते हैं यहां मीमांसा में एक ही ईश्वर है जिसके प्रति हवन होता हैं। यहां ये नहीं समझना चाहिए उस ईश्वर का ही हवन होता हैं । यहां कर्म में दो पुर्वोत्तर न्यास और प्र...

गीता भगवान कृष्ण के वचन नहीं है

कुछ शैव विरोधी भगवान शिव को नीचा दिखाने  केलिए भगवान् कृष्ण भगवान शिव का उपदेश किये हैं क्यों कि भगवान राम को भी शिव गीता का उपदेश देते हैं उसके चलते भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं  अनु गीता परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया।  इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम्॥१३॥ मेरे द्वारा सदाशिव के विषय मे बताया गया था और  परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया। इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम्॥१३॥ मेरे द्वारा परब्रह्म के विषय मे योग युक्त होकर बताया गया था  उस विषय में मैं तुम्हें एक पुरातन इतिहास बताऊँगा। यहां योग और युक्त समाहर ही योग युक्त है यहां सप्तमी तत्पुरुष समास है इसलिए यहां योग के अर्थ ऐश्र्वर्य आदि नहीं हो सकता हैं अगर भगवान् कृष्ण अपने पीछले जन्म में विद्या प्रप्ता हुआ उनके संस्कार नाश नहीं हो सकते हैं भगवद्गीता ११:४७ आत्मयोगत् यहां सप्तमी तत्पुरूष समसा है कोई वस्तु एक भाव या स्थिति के अंदर स्थित हो उसे सप्तमी में कहते हैं जैसे आत्मेषु योग: आत्म में युक्त होकर   यही अर्थ होता हैं क्यों कि यहां शतपथ ब्राह्मण में लिखा है रूद्...

नासदीय सुक्तं एक विश्लेषण

नाससदीय सुक्तं -ऋग्वेद मंडल १० सूक्त १२९ *१.नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।* *किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥ १॥* आदि में ना ही किसी (सत्)आस्तित्व था और ना ही (असत्) अनस्तित्व, मतलब इस जगत् की शुरुआत एक परिपुर्ण अदृश्य निराकार निर्गुण र्निविकलप ब्रह्म से हुई। तब न हवा थी, ना आसमान था और समय भी नहीं था परब्रह्म के परे कुछ था, *२. न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।* *आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२॥* चारों ओर समुन्द्र की भांति गंभीर और गहन बस अंधकार के आलावा कुछ नहीं था। उस समय न ही मृत्यु थी और न ही अमरता, मतलब न ही पृथ्वी पर कोई जीवन था और न ही स्वर्ग में रहने वाले अमर लोग थे, उस समय दिन और रात भी नहीं थे। उस समय बस उसके शक्ति से व्याप्त शब्द आकाश था अर्थात शब्द रुप के ॐ कार स्वरुप अक्षर ब्रह्म उसके बल था मतलब जिसका आदि या आरंभ न हो और जो सदा से एक तार (string) रुप में सदा परब्रह्म में व्यक्त हो *३. तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम् ।* *तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्...

पालयन अनुक्रम स्वरूप तथा आगम सुत्र

पालयन अनुक्रम स्वरूप तथा आगम सुत्र संस्कृत व्याकरण में आगम सुत्र का महत्व ऐसा है कि इसमें एक अक्षर का लोप हो जाता है उसके स्थान पर दुसरे अक्षर का अजाते हैं। जैसे स्वर वर्णों का अनुनासिक में उच्चारण होने पर वो लोग  हो जाता है क्योंकि वहां इत् संज्ञा प्रतिपादन होता है उसे संस्कृत भाषा में पालयन अनुक्रम अक्षर बोल सकते हैं जैसे राम + सु प्रत्यय में उ का जैसे स् + उ में उ कार का अनुनासिक रूप उच्चारण से उकार लोप हो जाता हैं क्योंकि वहां इत् प्रतिपादन होता है यह निर्देश व्याकरण अद्योच्चारणं शब्द से निर्देशित करते हैं। हमें लगता है संस्कृत से ही सी भाषा का विकास हुआ हैं। धन्यवाद हर हर महादेव 🙏

वेदज्ञान तथा सी भाषा

वेदज्ञान तथा सी भाषा  वेद में विषय का संधान करते हैं इससे निपात बोलते हैं सी भाषा में इसे objective code कहते हैं यहां तो विषय का भेद होते हैं जैसे अ स्वारादि इकार प्रत्यक्ष गोचर रूपत्व प्रकृति प्रत्ययान्तक हैं। इसलिए सी को भगवान का प्रोग्रेम भाषा कहते हैं। ऐसा ही वेद में शं प्रत्यय इत्यादि का संधान में अलग अलग अर्थोप्ति होता है यही objective code preference हैं यह वेद ज्ञान हैं।  हालांकि आधुनिक सी भाषा में कवेल  अंग्रेजी लिखते हैं ऐसा नहीं है की अन्य भाषाओं के अक्षर नहीं लिख सकते हैं। उसके केलिए अलग  संकेत वर्गीकरण कर सकते हैं धन्यवाद हर हर महादेव 🙏

व्याकरण ज्ञान तथा सी भाषा विकास

व्याकरण ज्ञान तथा सी भाषा विकास व्याकरण एक ऐसा विषय है जिसे वेद का मुख कहा हैं। अब मुख एक प्रधान प्रत्ययंत्क हैं अब इसे कंप्यूटर भाषा में header file  कहते हैं जैसे सी भाषा में लिखते हैं # include <std.io>•h  इसे लिखने मुख्य उद्देश्य है ये एक पहले ही निर्देशित कृत्य है ये संक्षिप्त हो जैसे यहां io ये एक ऐसा कृत्य है जो पहले से निर्देशित किया है ये हर एक software में होते हैं । इसे संस्कृत भाषा में  प्रक्रिया सामर्गी  कहते हैं । जैसे पाणिनि महार्षि जी के दो सुत्र में ये बात स्पष्ट करेंगे जब हम व्याकरण में पहले निविष्ट में आदिरत्येन सहेता इसमें प्रत्याहार सुत्र निर्देशित करते हैं जैसे दो शब्द में अनेक शब्द वाच्य को ग्रहण करते हैं जैसे अण् प्रत्याहार में अनेक वचन लुप्त हैं जैसे इसमें मध्याम अक्षर को भी ग्रहण किया जायेगा अ बोलने जैसे आ इ,ई ई,उ,ऊ ग्रहण किया जायेगा ये संस्कृत भाषा पहले दिपद हैं अ और ण् यहां पहले अक्षर ही header अर्थात प्रधान हैं। इसके व्याख्या जो पुर्वं न होते हुए भी परम हैं। वहीं आदि हैं। दुसरे सुत्र अणुदित सुवर्णस्य च प्रत्ययः यहां दीर्घ वाले अक्षर...

C programming in Vedas

C programming in Vedas C एक मध्यमवर्गीय भाषा हैं अर्थात यंत्र के संबंंधित भाषा को उच्चतम भाषा में बदल सकते हैं यही सी का मुख्य उद्देश्य है  वेद में कैसे सी भाषा हो सकता हैं? अब खुद के मन में विचार आये होगा आखिर कार वेद में ऐसा क्या है? इसका उत्तर निकालने हेतु हम इसे ही तीन भागों में बढ़ देंगे। १) भाषाज्ञान  २) व्याकरण ज्ञान ३) वेद ज्ञान भाषा ज्ञान समझने हेतु एक व्याकरण उससे ही भाषा का नियम वा syntax कहते हैं अब  आप के प्रश्न हो सकता है संस्कृत भाषा ही क्यों संस्कृत भाषा में एक द्वि तथा तीन पद होता हैं इसके एक भाषा के आधार तथा दत्त  सामग्री को data कहते हैं पहले यांत्रिक भाषा में द्विसंख्यात्मक अर्थात binary अंक निर्देशित करते हैं दुसरा अक्षरात्मक हैं इसे लोप आगम वा आदेश के अनुसार मानते हैं इसमें अक्षर का उत्पत्ति संधान ही मूल हैं लेकिन संख्या नियम में एक ही क्रिया को कही बार दौरान एक विधि नियम है यही उसकी मूल हैं ऐसा करने का कार्य को कंप्यूटर में  loop कहते हैं ये हो गया भाषा विज्ञान इसे पहले नियमक रूप मानते हैं इसके कारण एकान्तिक वा अनेकान्तिक निर्देशित क्रिया ...

विष्णु भगवान को वैकुंठ कैसे मिला

तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम् । पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम्॥३॥ ऋग्वेद-५:३:३ अनुवाद  हे अग्निदेव ! आपकी शोभा बढ़ाने के लिए मरुद्गण शोधन प्रक्रिया चलाते हैं । हे रुद्ररूप ! आपका जन्म सुन्दर और विलक्षण है । विष्णुदेव आपके निमित्त उपमा योग्य पद निर्धारित करते हैं। आप देवों के इन गुह्य अनुग्रहों को संरक्षित करें ॥३॥ यहां अग्नि मतलब भगवान शिव ही हैं क्योंकि शास्त्रों में ऐसा कहां है देखिए कालाग्नि रूद्र उपनिषद में लिखा है अ कार उ कार म कार ती रेखा अग्नि का हैं सब लोग लोकान्तर में  १)  प्रथम रेखा गार्हपत्य अग्निरूप, 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोकरूप, स्वात्मकरूप, क्रियाशक्तिरूप, ऋग्वेदस्वरूप, प्रातः सवनरूप तथा महेश्वरदेव के रूप की है॥६॥ २) द्वितीय रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ'कार रूप, सत्त्वरूप, अन्तरिक्षरूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यन्दिन सवनरूप एवं सदाशिव के रूप की है॥७॥ ३ तीसरी रेखा आहवनीयाग्नि रूप, 'म' कार रूप, तमरूप, द्यु-लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्तिरूप, सामवेदरूप, तृतीय सवनरूप तथा महादेवरूप की ...

धर्म कैसा रहेगा कलयुग में शिव पुराण

१) कलियुग में वेद प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था प्रायः नष्ट हो जायेगा। २) प्रत्येक वर्ण तथा वर्णाअश्राम त्याग करनेवाले मनुष्य अपने वर्ण से विपरित कार्य  में ही अपना सुख प्राप्त करेंगे। ३) इसके कारण लोगों में वर्णसंकरता बढ जायेगी। परिवार टुट जायेंगे धर्म बिखर जायेगा।एवं लोगों के पतन होगा। ४) प्राकृतिक आपदाओं से लोगों कि जगह जगह पर मृत्यु होगी। ५) धन का क्षय होगा लोगों को लोभ के प्रवृत्ति बढ़ जायेगा ६) ब्राह्मण प्रायः लोभी हो जायेंगे वेद को बेचकर आजिविका करने वाले होंगे ७) मद मोह में उल्लासित होकर दुसरे को टोकने वाले होंगे। ८) पुजा पाठ नहीं करेंगे तथा ब्राह्म ज्ञान शुन्य होंगे। ९) क्षत्रीय प्रायः अपने धर्म का विपरित होकर कुंसगी पापि एवं व्योभीचारि होंगे। ९०) शौर्य पराक्रम से शुन्य हो जायेंगे। ११) शुद्रवत काम करने लगेंगे और शुद्र समान हो जायेंगे । १२) सब काम के आधीन होंगे। १३) वश्य अपने धर्म से विमुख हो जायेंगे १४) कुमार्ग से धन अर्जित करने में लगे रहेंगे। १५) तोलमौपन में अधिक ध्यान देते हुए लोगों के धन अर्जित करने वाले होंगे १६) शुद्र भी अपने धर्म से विमुख होंगे। १७) सिर्फ अच्छी वेशभूषा म...

लिंग पुराण में सृष्टि रहस्य

सृष्टि का कथन लिंग पुराण १)अव्यक्त सदाशिव का अल्लिंग रूप से लिंग रूप अर्थात प्रपंच का निर्माण हुआ। २) हमारे तीन लिंग रूप है अल्लिङ्ग लिङ्ग तल्लिङ्ग ३) अलिङ्ग अव्यक्त कारण है लिंग रूप का कारण तल्लिंग प्रधान कारण है। अल्लिंग में मेरा अर्थात सदाशिव रूप ही विद्यमान हैं। ४) लिंग रूप गन्ध रस शब्द स्पर्श रूपादि गुणों से युक्त हैं इसे कोई प्रपंच कहते हैं। ५) अल्लिंग रूप इन सब से वर्जित हैं ये अद्वैत तत्व है इनमें सिर्फ एक वस्तु प्रतिष्ठित हैं वहीं में हुं ६) तल्लिङ्ग रूप मेरा प्रधान कारण है इन कारण से ही प्रपंच बना हैं इनको विष्णु कहते हैं ये मेरा शैवा रूप को दर्शाता हैं ७) यह तत्व सात आठ ग्यारह रूपों में विभक्त है ये सब हमासे युक्त तथा उत्पन्न हुआ है इसलिए इन्हें विभु कहते हैं। ८) हमारे सात तत्वों में उदर्व  एवं अधो भाग के सात लोक लोकान्तर अभिव्यक्त हैं।  ९) सत्यतपज्ञानजनमर्हसुर्वभुर्वभुः ये उधर्व में स्थित हैं। १०) अतलवितलसुतलतलातलमहातलरसातलपातलः ये सब अधो भाग में स्थित है ११) हमारे ग्यारह तत्वों में पांच ज्ञानेन्द्रियो पांच कर्मेंद्रियों एक मन सामसित हैं।