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विष्णु भगवान को वैकुंठ कैसे मिला

तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम् । पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम्॥३॥ ऋग्वेद-५:३:३ अनुवाद  हे अग्निदेव ! आपकी शोभा बढ़ाने के लिए मरुद्गण शोधन प्रक्रिया चलाते हैं । हे रुद्ररूप ! आपका जन्म सुन्दर और विलक्षण है । विष्णुदेव आपके निमित्त उपमा योग्य पद निर्धारित करते हैं। आप देवों के इन गुह्य अनुग्रहों को संरक्षित करें ॥३॥ यहां अग्नि मतलब भगवान शिव ही हैं क्योंकि शास्त्रों में ऐसा कहां है देखिए कालाग्नि रूद्र उपनिषद में लिखा है अ कार उ कार म कार ती रेखा अग्नि का हैं सब लोग लोकान्तर में  १)  प्रथम रेखा गार्हपत्य अग्निरूप, 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोकरूप, स्वात्मकरूप, क्रियाशक्तिरूप, ऋग्वेदस्वरूप, प्रातः सवनरूप तथा महेश्वरदेव के रूप की है॥६॥ २) द्वितीय रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ'कार रूप, सत्त्वरूप, अन्तरिक्षरूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यन्दिन सवनरूप एवं सदाशिव के रूप की है॥७॥ ३ तीसरी रेखा आहवनीयाग्नि रूप, 'म' कार रूप, तमरूप, द्यु-लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्तिरूप, सामवेदरूप, तृतीय सवनरूप तथा महादेवरूप की ...

धर्म कैसा रहेगा कलयुग में शिव पुराण

१) कलियुग में वेद प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था प्रायः नष्ट हो जायेगा। २) प्रत्येक वर्ण तथा वर्णाअश्राम त्याग करनेवाले मनुष्य अपने वर्ण से विपरित कार्य  में ही अपना सुख प्राप्त करेंगे। ३) इसके कारण लोगों में वर्णसंकरता बढ जायेगी। परिवार टुट जायेंगे धर्म बिखर जायेगा।एवं लोगों के पतन होगा। ४) प्राकृतिक आपदाओं से लोगों कि जगह जगह पर मृत्यु होगी। ५) धन का क्षय होगा लोगों को लोभ के प्रवृत्ति बढ़ जायेगा ६) ब्राह्मण प्रायः लोभी हो जायेंगे वेद को बेचकर आजिविका करने वाले होंगे ७) मद मोह में उल्लासित होकर दुसरे को टोकने वाले होंगे। ८) पुजा पाठ नहीं करेंगे तथा ब्राह्म ज्ञान शुन्य होंगे। ९) क्षत्रीय प्रायः अपने धर्म का विपरित होकर कुंसगी पापि एवं व्योभीचारि होंगे। ९०) शौर्य पराक्रम से शुन्य हो जायेंगे। ११) शुद्रवत काम करने लगेंगे और शुद्र समान हो जायेंगे । १२) सब काम के आधीन होंगे। १३) वश्य अपने धर्म से विमुख हो जायेंगे १४) कुमार्ग से धन अर्जित करने में लगे रहेंगे। १५) तोलमौपन में अधिक ध्यान देते हुए लोगों के धन अर्जित करने वाले होंगे १६) शुद्र भी अपने धर्म से विमुख होंगे। १७) सिर्फ अच्छी वेशभूषा म...

नास्तिक का पर्दाफाश १

नास्तिक का पर्दाफाश क्या अर्थवेद में रूद्र देवता का मूत्र पीना लिखा है। पहले बात जब अथर्ववेद में आयुर्वेद का वर्णन करते हैं तो कौनसा आयुर्वेद विश्वविद्यालय में पढ़ें हो हकिम वैद्य तुमने संस्कृत पढ़ें बिना ये कैसा समझ लिया उसका हिन्दी अर्थ ऐसा ही होगा। अगर हिम्मत है तो बोलो विज्ञान में अंधकार में से आपस् तत्व प्री मेटर कहां से निकला तेरे विज्ञानी लोग वहां बैठ कर देख रहे थे क्या ? रुद्रस्य मूत्रमस्यमृतस्य नाभिः । विषाणका नाम वा असि पितॄणां मूलादुत्थिता वातीकृतनाशनी ॥३॥ रूद्रस्य इति संदर्भे पष्ठी शेषे वा सन्दर्भे इदं इति पष्ठी कारकस्य प्रयोगत्मूत्रशब्दस्य प्रयोगः विधते  मूत्र वा मूत्र--अच्  क्षरितजले अमरः ।क्षर रहितं तद जलं क्षरितजलं इति आयुर्वेदस्य तत्त्वानि रसाभूतानि वा भवति। यथा सर्वाणि वा रसानि सोमत्मकानि या भवति तस्य नाभिः इति पदार्थेन व्याख्यानं विद्यते अयमेव न्याये रसो वै सः इति मत्वे आपस्सन्धाने पृथ्व्यां औषधयादयः भूता तनि सर्वाणि रसो मयं रसापि सदाशिवस्य शक्ति रूपाद्वैव उत्पन्नः भवति। यथा रूद्रो वै प्राणः , वायु वै प्राणः इत्यादि शृति वचनेषु च आकाशस्शब्दस्पर्शः सन्धाने वा...