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गाणपत्य मत के प्रमाण

गाणपत्य मत की ऐतिहासिकता और शास्त्रीय प्रामाणिकता को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए, यहाँ वेदों, न्याय-वैशेषिक दर्शन, समस्त प्रमुख महापुराणों तथा विभिन्न आगम व तंत्र ग्रंथों से प्रामाणिक संस्कृत श्लोक, उनके सटीक संदर्भ और अर्थ एक साथ संकलित हैं: --- १. वेदों और उपनिषदों में प्रमाण वैदिक संहिताओं और उपनिषदों में गणपति को ब्रह्मांड के मूल तत्व और सर्वोच्च शासक (ब्रह्मणस्पति) के रूप में स्वीकार किया गया है। अ) ऋग्वेद (मण्डल २, सूक्त २३, मंत्र १) गाणपत्य मत का यह सबसे प्राचीन और अचूक मूल प्रमाण है: “गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणाम् ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिःसीदसादनम्॥” अर्थ: हे गणों के स्वामी (गणपति)! आप ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं। आप वेदों और प्रार्थनाओं के अधिपति हैं। हमारी प्रार्थना सुनकर अपनी रक्षा शक्तियों के साथ इस यज्ञ आसन पर विराजें। ब) यजुर्वेद (तैत्तिरीय आरण्यक - नारायण उपनिषद) वैदिक काल में गणेश गायत्री का प्रयोग उनकी सर्वोच्च ब्रह्म सत्ता को दर्शाता है: “तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥” अर्थ: हम ...
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वीरशैव के इतिहास संक्षिप्त

क्या वीरशैव और लिंगायत एक ही हैं? — शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक प्रमाण आज सामान्य बोलचाल में "वीरशैव" और "लिंगायत" शब्दों का एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। किन्तु अनेक विद्वान, मठ तथा ऐतिहासिक स्रोत दोनों में भेद भी बताते हैं। यह विषय आज भी चर्चा का विषय है, इसलिए निष्पक्ष रूप से शास्त्रीय और ऐतिहासिक प्रमाणों को देखना आवश्यक है। 1. वीरशैव परंपरा का शास्त्रीय आधार वीरशैव परंपरा स्वयं को प्राचीन शैव परंपरा मानती है तथा निम्नलिखित शास्त्रों को प्रमाण मानती है— - वेद - उपनिषद् - शैव आगम - शिवपुराण - लिंगपुराण - न्याय दर्शन - वैशेषिक दर्शन - पंचाचार्य परंपरा (क) वैदिक प्रमाण तैत्तिरीय संहिता (श्रीरुद्रम 4.5.8) «नमः शिवाय च शिवतराय च।» यह पंचाक्षरी "नमः शिवाय" का वैदिक आधार माना जाता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.2 «एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।» अर्थ — केवल एक ही रुद्र है, उसके समान दूसरा कोई नहीं। (ख) पुराण प्रमाण लिंगपुराण «लिङ्गार्चनात् परो धर्मो न भूतो न भविष्यति।» अर्थ — लिंग की आराधना से बढ़कर कोई धर्म न हुआ है और न होगा। शिवपुराण «शिव एव परं ब्रह्...

पशुपत मत का इतिहास

पाशुपत सम्प्रदाय का इतिहास: इसकी शुरुआत किसने की और कैसे हुई? (वेद, उपनिषद, पुराण और ऐतिहासिक प्रमाण सहित) पाशुपत सम्प्रदाय सनातन धर्म की सबसे प्राचीन शैव परम्पराओं में से एक है। इसका आधार भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप पर है। 'पशु' का अर्थ केवल पशु-प्राणी नहीं, बल्कि कर्म, अविद्या और माया के बंधन में बंधे सभी जीव हैं, और 'पति' का अर्थ उनके स्वामी, रक्षक तथा मुक्तिदाता है। इसलिए भगवान शिव को पशुपति कहा जाता है। इसका सबसे प्राचीन प्रमाण यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (तैत्तिरीय संहिता 4.5.1) में मिलता है— «नमो भवाय च रुद्राय च। नमः शर्वाय च पशुपतये च॥» अर्थ: भव, रुद्र, शर्व तथा समस्त जीवों के स्वामी पशुपति को नमस्कार। यह सिद्ध करता है कि 'पशुपति' नाम किसी बाद की कल्पना नहीं, बल्कि वैदिक काल से भगवान रुद्र का प्रतिष्ठित नाम है। अथर्वशिरस उपनिषद में भगवान रुद्र स्वयं बताते हैं कि जो जीव पाश (अविद्या, कर्म और माया) में बंधा है वह 'पशु' है और जो उसे इन बंधनों से मुक्त करता है वही पशुपति है। इसी उपनिषद से पाशुपत दर्शन की मूल दार्शनिक अवधारणा स्पष्ट होती है। बाद ...

क्या पशुपत काल्पनिक हैं

क्या भगवान शिव का 'पशुपति' स्वरूप काल्पनिक है? जानिए वेदों, उपनिषदों, महाभारत, पुराणों, पुरातत्त्व और पाशुपत दर्शन के प्रमाण  आज के आधुनिक युग में अनेक लोग भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप को केवल एक पौराणिक कल्पना या प्रतीकात्मक कथा मान लेते हैं, किन्तु भारतीय धार्मिक परंपरा, वैदिक साहित्य, पुराण, महाकाव्य और पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि 'पशुपति' की अवधारणा अत्यन्त प्राचीन है और सनातन परंपरा में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। 'पशुपति' शब्द 'पशु' और 'पति' से मिलकर बना है। वैदिक और शैव परंपरा में 'पशु' का अर्थ केवल पशु-प्राणी नहीं, बल्कि बंधनों में बंधे सभी जीव भी माना गया है, जबकि 'पति' का अर्थ उनके स्वामी, रक्षक और मुक्तिदाता से है। इस प्रकार पशुपति वह हैं जो समस्त प्राणियों तथा बंधनग्रस्त जीवों के अधिपति हैं। इस स्वरूप का उल्लेख वैदिक साहित्य में भी मिलता है। यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (नमकम्) में प्रसिद्ध मंत्र "नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च" आता है, जिसमें रुद्र को 'पशुपति...

बैबल एवं हिन्दू धर्म वेद निन्दा का दंड

ईसाई जो वेद का खण्डन करते हैं उसके साथ क्या होगा इस के दो तथ्य के आधार पर पेश करेंगे  बैबल एवं हिन्दू  बैबल में कहा हैं कि उनको बहुत रवरव नरक मिलेगा यहां पर ये स्पष्ट तोर पर कहा हैं कि वेद भी परमेश्वर का वचन हैं क्योंकि  रोमन 1:20 में कहा गया है:   "परमेश्वर की अनदेखी सृष्टि से ही उसके नित्य सामर्थ्य और देवत्व को समझा जा सकता है"  यहाँ "अनदेखी सृष्टि" से तात्पर्य है वेदों में वर्णित सृष्टि के नियम और परमेश्वर की महिमा को दर्शाता हैं। कुलुस्सियों 2:8  में कहा गया है:  "किसी को दर्शनशास्त्र और व्यर्थ धोखे से न बहकाए, जो मनुष्यों की परंपरा और संसार की मूल तत्वों पर आधारित हैं, न कि मसीह पर"  यहाँ "मनुष्यों की परंपरा" के अलावा अन्य ज्ञान को भी परमेश्वर का ज्ञान माना गया है, जिसमें वेद भी शामिल हैं। हिन्दू धर्म में गरूड पुराण में लिखा हैं उन्हें कलपक नरक मिलता हैं जहां उनके प्रत्येक अंगों को यमदूत नोच नोचकर अलग-अलग करेंगे। भाई, बाइबिल में भी ऐसे लोगों के लिए दंड वर्णित हैं: बाइबिल के अनुसार: 1. अनन्त आग में डाला जाना - मत्ती 25:41 2. अन्धकार में ड...

महिषासुर के साथ विष्णु तथा भगवान शिव के युद्ध

महिषासुर के साथ विष्णु तथा भगवान शिव के युद्ध महिषासुर एक प्रलयंकर दानव था उन्होंने यह वर पालकर रखा था हमारे मृत्यु किसी प्रकार के जीव अस्त्र से हमारे मृत्यु नहीं अमर होने के अर्थ यह नहीं हैं मृत्यु ना हो बहुत काल तक हमें संकट ना हो  अब पहले भगवान विष्णु तत्क्षण युद्ध क्षेत्र में आये और महिषासुर से युद्ध करने लगे अनेक प्रकार के अस्त्र एवं शास्त्रों से पर्वत के समान विसाल वस्तुओं से युद्ध हुआ तदन्तर विष्णु भगवान अपने गदा से असुर के शिर पर प्रहार कि और असुर मुर्छित हो गया तब असुर सेना हाहाकार मचा गया। यहां पुराण के कथा में भयानक रस हैं अर्थात यहां यह करने का अर्थ हैं हम भगवान के भक्ति से बड़े से बड़े भयानक संगत में भी खड़े हो सकते हैं। यहां भगवान भक्ति कि महत्व समझाया गया हैं। आगे वह दानव आपने भक्ति के बल से खड़ा हो गया और एक परिध लेकर असुर ने भगवान विष्णु पर असुर प्रहार किया इससे विष्णु भगवान मुर्छित हो गये तत्क्षण गरुड ने विष्णु भगवान को मुर्छित देखकर उन्हें युद्ध स्थल से दुर लेकर चला गया।तब देवता लोग भयभीत हो गए तब उनके भय को देखकर करुण भाव में शंकर भगवान वहां आये भगवान शिव कि भाय...

हनुमान

आर्य समाज खण्डन आक्षेप  शिव पुराण शतरुद्र संहिता  मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को पैदा किया – [वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15] मरुत वायु/हवा का पुत्र है और आपको बता दूं पार्वती बी हनुमान को अपना पुत्तर कहती है, अब सोचने वाली बात ये है हनुमान अंजना और हवा के बेटे मरूत का पुत्र है तो पार्वती का पुत्र कैसे हुआ.. 🤔 खण्डन  चक्रे स्वं क्षुभितं शम्भुः कामबाणहतो यथा। स्वं वीर्यमपतयामास रामकार्यार्थमीश्वरः॥ 4॥ उस भगवान विष्णु प्रकृति रूप के मोहिनी देखते ही मन में अविद्या वृत्ति भेद न्याय से अपने आपको कामबाण से अर्थात इच्छा में विक्षुब्ध कर लिए कैसे इच्छा अर्थात प्रकृति तत्वों में परिवर्तन करने कि इच्छा से भगवान राम जी कार्य हेतु अपने आत्मा से जो कि सत्य है उससे एक सत्य अर्थात तेज को उत्सर्जन कर लिया  तद्वीर्यं स्थापयामासुः पत्रे सप्तर्षयश्च ते। प्रेरणा मनसा तेन रामकार्यार्थमादरात्॥ 5॥ उस तेज‌ अर्थात अग्नि सोमात्मक रुप को सप्त ऋषियों ने एक भगवान शिव जी के इच्छा से एक पत्र में अर्थात राक्षा करने वाले आधार में स्थापित कि इस अग्नि सोमात्मक से जैविक तत्वों के निर्माण हुआ जैसे...