पाशुपत सम्प्रदाय का इतिहास: इसकी शुरुआत किसने की और कैसे हुई? (वेद, उपनिषद, पुराण और ऐतिहासिक प्रमाण सहित)
पाशुपत सम्प्रदाय सनातन धर्म की सबसे प्राचीन शैव परम्पराओं में से एक है। इसका आधार भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप पर है। 'पशु' का अर्थ केवल पशु-प्राणी नहीं, बल्कि कर्म, अविद्या और माया के बंधन में बंधे सभी जीव हैं, और 'पति' का अर्थ उनके स्वामी, रक्षक तथा मुक्तिदाता है। इसलिए भगवान शिव को पशुपति कहा जाता है।
इसका सबसे प्राचीन प्रमाण यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (तैत्तिरीय संहिता 4.5.1) में मिलता है—
«नमो भवाय च रुद्राय च।
नमः शर्वाय च पशुपतये च॥»
अर्थ: भव, रुद्र, शर्व तथा समस्त जीवों के स्वामी पशुपति को नमस्कार।
यह सिद्ध करता है कि 'पशुपति' नाम किसी बाद की कल्पना नहीं, बल्कि वैदिक काल से भगवान रुद्र का प्रतिष्ठित नाम है।
अथर्वशिरस उपनिषद में भगवान रुद्र स्वयं बताते हैं कि जो जीव पाश (अविद्या, कर्म और माया) में बंधा है वह 'पशु' है और जो उसे इन बंधनों से मुक्त करता है वही पशुपति है। इसी उपनिषद से पाशुपत दर्शन की मूल दार्शनिक अवधारणा स्पष्ट होती है।
बाद में इसी वैदिक आधार पर पाशुपत सम्प्रदाय का विकास हुआ। परम्परा के अनुसार इस सम्प्रदाय के आदि गुरु स्वयं भगवान शिव हैं। माना जाता है कि भगवान शिव ने यह ज्ञान ऋषियों को प्रदान किया और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से यह आगे बढ़ता गया।
पुराणों में इस परम्परा के पुनरुत्थान का उल्लेख मिलता है। लिंग पुराण, वायु पुराण तथा कूर्म पुराण में वर्णन है कि भगवान शिव ने लकुलीश (लाकुलीश) नाम से अवतार लेकर पाशुपत धर्म का पुनः प्रचार किया। लकुलीश को शिव का 28वाँ अवतार कहा गया है। उनके चार प्रमुख शिष्य—कुशिक, गर्ग, मित्र और कौरुष्य—ने इस सम्प्रदाय का भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचार किया।
ऐतिहासिक दृष्टि से अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि लकुलीश का समय लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी (लगभग 125–200 ई.) था। उनका प्रमुख केन्द्र वर्तमान गुजरात के कायावरोहण (कारवन) क्षेत्र को माना जाता है। यहीं से संगठित पाशुपत सम्प्रदाय का विस्तार गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर भारत, दक्कन तथा नेपाल तक हुआ। अनेक अभिलेख, मंदिर और शिलालेख इस सम्प्रदाय के व्यापक प्रभाव का प्रमाण देते हैं।
पाशुपत सम्प्रदाय की साधना अन्य शैव परम्पराओं से कुछ भिन्न थी। इसमें भस्म धारण करना, रुद्र-जप, योग, तपस्या, शिव-भक्ति तथा वैराग्य को अत्यन्त महत्व दिया गया। इस सम्प्रदाय का मुख्य उद्देश्य भगवान पशुपति की कृपा से जीव को कर्म, अविद्या और संसार के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्राप्त कराना था।
इस प्रकार यदि प्रश्न हो कि "पाशुपत सम्प्रदाय किसने शुरू किया?", तो उत्तर दो स्तरों पर समझा जाता है—
धार्मिक परम्परा के अनुसार: इसके मूल प्रवर्तक स्वयं भगवान शिव (पशुपति) हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से: संगठित पाशुपत सम्प्रदाय के संस्थापक या पुनर्संगठक भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले लकुलीश थे, जिन्होंने दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास इस सम्प्रदाय को व्यवस्थित रूप दिया और अपने शिष्यों के माध्यम से पूरे भारत में इसका प्रचार किया।
इस प्रकार वेदों में 'पशुपति' नाम, उपनिषदों में उसका दार्शनिक अर्थ, पुराणों में शिव द्वारा लकुलीश अवतार की कथा और इतिहास में लकुलीश द्वारा संगठित पाशुपत सम्प्रदाय—ये सभी मिलकर इस परम्परा की प्राचीनता और विकास का क्रम स्पष्ट करते हैं।
🚩 हर हर महादेव। जय पशुपतिनाथ। 🚩
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