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वीरशैव के इतिहास संक्षिप्त

क्या वीरशैव और लिंगायत एक ही हैं? — शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक प्रमाण

आज सामान्य बोलचाल में "वीरशैव" और "लिंगायत" शब्दों का एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। किन्तु अनेक विद्वान, मठ तथा ऐतिहासिक स्रोत दोनों में भेद भी बताते हैं। यह विषय आज भी चर्चा का विषय है, इसलिए निष्पक्ष रूप से शास्त्रीय और ऐतिहासिक प्रमाणों को देखना आवश्यक है।

1. वीरशैव परंपरा का शास्त्रीय आधार

वीरशैव परंपरा स्वयं को प्राचीन शैव परंपरा मानती है तथा निम्नलिखित शास्त्रों को प्रमाण मानती है—

- वेद
- उपनिषद्
- शैव आगम
- शिवपुराण
- लिंगपुराण
- न्याय दर्शन
- वैशेषिक दर्शन
- पंचाचार्य परंपरा

(क) वैदिक प्रमाण

तैत्तिरीय संहिता (श्रीरुद्रम 4.5.8)

«नमः शिवाय च शिवतराय च।»

यह पंचाक्षरी "नमः शिवाय" का वैदिक आधार माना जाता है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.2

«एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।»

अर्थ — केवल एक ही रुद्र है, उसके समान दूसरा कोई नहीं।

(ख) पुराण प्रमाण

लिंगपुराण

«लिङ्गार्चनात् परो धर्मो न भूतो न भविष्यति।»

अर्थ — लिंग की आराधना से बढ़कर कोई धर्म न हुआ है और न होगा।

शिवपुराण

«शिव एव परं ब्रह्म शिव एव परं तपः।»

अर्थ — शिव ही परब्रह्म हैं और शिव ही परम तप हैं।

(ग) शैव आगम

कामिकागम, कारणागम, मृगेन्द्रागम आदि शैव आगमों में शिव, गुरु, लिंग, दीक्षा तथा शैव साधना का विस्तृत वर्णन मिलता है। वीरशैव परंपरा इन्हें वेद के अनुरूप प्रमाण मानती है।

(घ) न्याय दर्शन

न्यायसूत्र 1.1.3

«प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि।»

अर्थ — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—ये चार प्रमाण हैं।

(ङ) वैशेषिक दर्शन

वैशेषिकसूत्र 1.1.2

«यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।»

अर्थ — जिससे अभ्युदय (लोककल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है।

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2. लिंगायत परंपरा

लिंगायत परंपरा का ऐतिहासिक स्वरूप 12वीं शताब्दी में महात्मा बसवन्ना तथा अन्य शरणों के वचन-आंदोलन से प्रसिद्ध हुआ।

कई लिंगायत विद्वान मानते हैं कि उनकी धार्मिक पहचान बसवन्ना के आंदोलन से विशेष रूप से विकसित हुई। कुछ इसे हिंदू धर्म की एक परंपरा मानते हैं, जबकि कुछ इसे स्वतंत्र धर्म मानते हैं।

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3. दोनों में अंतर क्यों माना जाता है?

वीरशैव परंपरा स्वयं को वेद, उपनिषद्, शैव आगम, पुराण और पंचाचार्य परंपरा पर आधारित प्राचीन शैव संप्रदाय मानती है।

दूसरी ओर, लिंगायत परंपरा का प्रमुख ऐतिहासिक स्वरूप बसवन्ना और शरण आंदोलन से जुड़ा माना जाता है। इसी कारण अनेक विद्वान दोनों में भेद स्वीकार करते हैं, जबकि अनेक लोग "वीरशैव-लिंगायत" को एक संयुक्त परंपरा भी मानते हैं।

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निष्कर्ष

वेद, उपनिषद्, पुराण, न्यायसूत्र और वैशेषिकसूत्र में "वीरशैव" और "लिंगायत" के बीच प्रत्यक्ष भेद का उल्लेख नहीं मिलता। इन शास्त्रों से शिवोपासना, लिंग-पूजा, धर्म तथा प्रमाण-तत्त्व का आधार प्राप्त होता है।

वीरशैव और लिंगायत के भेद का प्रश्न मुख्यतः मध्यकालीन इतिहास, वीरशैव आचार्यों के ग्रंथों, पंचाचार्य परंपरा, शैव आगमों तथा बसवन्ना के वचन-आंदोलन के अध्ययन पर आधारित है।

अतः इस विषय पर चर्चा करते समय शास्त्रीय प्रमाणों के साथ ऐतिहासिक साक्ष्यों का भी निष्पक्ष अध्ययन आवश्यक है।

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