गणेश परब्रह्म की मयुरेश्वर अवतार का रहस्य अष्टविनायक का अवतार में एक अवतार मोरेश्वर या मयुरेश्वर हैं कहानी इस प्रकार उद्धृत किया गया है जब मता पर्वती गं बीजाक्षर का तप की तो गणेश भगवान जो कि परब्रह्म परमात्मा हैं वो माता पार्वती का बेटे के रूप में अवतरित होने का वर दी अब गं बीजाक्षर में ऐसा क्या है जिससे भगवान गणेश खुश होते हैं।ग का अर्थ गुरुस्त वर्ग है इसमें सुक्ष्म तन्मत्र से गुरु तन्मत्र में अनुशिलन होने का रहस्य छुपा है समस्त गोचर वस्तु गुरु रूप में अभिप्रेत होता है जब सिन्धु नामक राक्षस अमृत मय सुवर्ण अन्डो से अमृत्व को पा लिया उन्होंने डर के मारे वो तीन अण्डे जो वर के रूप में दिया गया था उसे निगल लिया क्यों कि भगवान सुर्य देव ने उन्हें तुट जाने का अर्थ से बोलते थे कि इनके नष्ट होने पर सारे अमृत्व को खो देगा तो उन्होंने उसे निगल लिया अब परब्रह्म परमात्मा गणपति भगवान आम्र वृक्ष कि नीचे एक अण्डे को उनके गुरूत्व पैर को तब आघात किया तो अण्डे फुट कर उनसे मयुर उत्पन्न हुआ उनको गणेश भगवान आपने वाहन बनाकर राक्षस के पेट चीर दिया उनसे अमृत मय अण्डे फुट गया और राक्षस जो तीनों लोको...