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RIGVEDA 1

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्न धातमम् Translation: The above mantra is benediction to Agni devta it states that verily the priest of the sacrifice and the sage and the fire god himself who invokes the deity let sage and hothar of sacrifice praise Lord Agni with hymn one who is embodied with precious stones and radiant messenger of gods. notes acharya sayana predicate that one should praise LordAgni who is priest of sacrifice who invocate the all god is embodied with precious stones so every sage or होतरा of sacrifice should praise God Agni with hymn and worship the god Agni commentary This is the first mantra of rigveda the worshipers ,the होतराcalled ऋत्विज has been stated all necessary predication has been explained in sacrifice all the relevant parts of the sacrifices necessarily predicated had been imposed on Lord Agni पुरोहितं : The word " पुरोहितं " indicated to chief teacher or chief performer of‌ sacrifice so indicate necessarily that he should be...

भागवत महापुराण

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्वार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्  तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यतसूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १) जन्म आदि अस्य यतः इस में समस्त संसार का जगत के उपादान कारण रुप महानारयण का स्वरूप का कथन किया गया हैं, जड़ वस्तु आदि में स्वयं विवेक प्रत्यय नहीं होता हैं ,जड़ वस्तु अपने अस्तित्व के बारे में नहीं जान सकता हैं। अगर कोई ये मानें की किसी वस्तु एक चेतना के इच्छा के बिना ही प्रकट हो गया तो बहुत ही हस्य सपद बात हैं वेदादि ग्रंथों में बहुत से बार ऐक्ष धातु का प्रयोग होता हैं यहां इसका अर्थ सक्षी के रूप में संकल्प करना अगर कोई ये कहे की भगवान के रहित उस वस्तु ही प्रदान था तो उसमें भगवान निमित्त मात्र था तो भगवान उस वस्तु क्यों जानेगा जिसमें हो निमित्त मात्र था। अगर घड़ा बनाने वाले कुम्हार भी अपने रहित वस्तु जानकर ही कार्य करता हैं घड़े स्वयं नहीं बनते उस का कारण ही एक चेतन ही हैं । संख्या दर्शन ये उदाहरण का अर्थ ये नहीं कुम्हार बहार हैं अंदर भी हैं सो निमित्त मात्र हैं । ये केवल द्वैत में सही हैं। क्यो...

नारायण सुक्त का सार

नारायणसूक्तम् ॐ स॒ह ना॑ववतु। स॒ह नौ॑ भुनक्तु। स॒ह वी॒र्यं॑ करवावहै । ते॒ज॒स्विना॒वधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषा॒वहै᳚ ॥ ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥ परम आत्मान्!  कृपय...

आदि शंकराचार्य नारी नरक का द्वार किस संदर्भ में कहा हैं?

कुछ लोग जगद्गुरू आदि शंकराचार्य जी पर अक्षेप करते हैं उन्होंने नारि को नरक का द्वार कहा हैं वास्तव में नारी को उन्होंने नारी को नरक के द्वार नहीं कहते परन्तु यहां इसके अर्...

वेद मानव को कैसे मिला?

वेद नाम किम् ? वेद क्या हैं? १)" वेदयति इति वेदः"। वेद को ज्ञान कहा हैं वेदयति शब्द से स्वय पर ब्रह्म परमात्मा से ही बोधन सिद्ध होता हैं। २) वेदं इति पदम् " विद् धातोः निष्पन्नः भव...