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पालयन अनुक्रम स्वरूप तथा आगम सुत्र

पालयन अनुक्रम स्वरूप तथा आगम सुत्र संस्कृत व्याकरण में आगम सुत्र का महत्व ऐसा है कि इसमें एक अक्षर का लोप हो जाता है उसके स्थान पर दुसरे अक्षर का अजाते हैं। जैसे स्वर वर्णों का अनुनासिक में उच्चारण होने पर वो लोग  हो जाता है क्योंकि वहां इत् संज्ञा प्रतिपादन होता है उसे संस्कृत भाषा में पालयन अनुक्रम अक्षर बोल सकते हैं जैसे राम + सु प्रत्यय में उ का जैसे स् + उ में उ कार का अनुनासिक रूप उच्चारण से उकार लोप हो जाता हैं क्योंकि वहां इत् प्रतिपादन होता है यह निर्देश व्याकरण अद्योच्चारणं शब्द से निर्देशित करते हैं। हमें लगता है संस्कृत से ही सी भाषा का विकास हुआ हैं। धन्यवाद हर हर महादेव 🙏

वेदज्ञान तथा सी भाषा

वेदज्ञान तथा सी भाषा  वेद में विषय का संधान करते हैं इससे निपात बोलते हैं सी भाषा में इसे objective code कहते हैं यहां तो विषय का भेद होते हैं जैसे अ स्वारादि इकार प्रत्यक्ष गोचर रूपत्व प्रकृति प्रत्ययान्तक हैं। इसलिए सी को भगवान का प्रोग्रेम भाषा कहते हैं। ऐसा ही वेद में शं प्रत्यय इत्यादि का संधान में अलग अलग अर्थोप्ति होता है यही objective code preference हैं यह वेद ज्ञान हैं।  हालांकि आधुनिक सी भाषा में कवेल  अंग्रेजी लिखते हैं ऐसा नहीं है की अन्य भाषाओं के अक्षर नहीं लिख सकते हैं। उसके केलिए अलग  संकेत वर्गीकरण कर सकते हैं धन्यवाद हर हर महादेव 🙏

व्याकरण ज्ञान तथा सी भाषा विकास

व्याकरण ज्ञान तथा सी भाषा विकास व्याकरण एक ऐसा विषय है जिसे वेद का मुख कहा हैं। अब मुख एक प्रधान प्रत्ययंत्क हैं अब इसे कंप्यूटर भाषा में header file  कहते हैं जैसे सी भाषा में लिखते हैं # include <std.io>•h  इसे लिखने मुख्य उद्देश्य है ये एक पहले ही निर्देशित कृत्य है ये संक्षिप्त हो जैसे यहां io ये एक ऐसा कृत्य है जो पहले से निर्देशित किया है ये हर एक software में होते हैं । इसे संस्कृत भाषा में  प्रक्रिया सामर्गी  कहते हैं । जैसे पाणिनि महार्षि जी के दो सुत्र में ये बात स्पष्ट करेंगे जब हम व्याकरण में पहले निविष्ट में आदिरत्येन सहेता इसमें प्रत्याहार सुत्र निर्देशित करते हैं जैसे दो शब्द में अनेक शब्द वाच्य को ग्रहण करते हैं जैसे अण् प्रत्याहार में अनेक वचन लुप्त हैं जैसे इसमें मध्याम अक्षर को भी ग्रहण किया जायेगा अ बोलने जैसे आ इ,ई ई,उ,ऊ ग्रहण किया जायेगा ये संस्कृत भाषा पहले दिपद हैं अ और ण् यहां पहले अक्षर ही header अर्थात प्रधान हैं। इसके व्याख्या जो पुर्वं न होते हुए भी परम हैं। वहीं आदि हैं। दुसरे सुत्र अणुदित सुवर्णस्य च प्रत्ययः यहां दीर्घ वाले अक्षर...

C programming in Vedas

C programming in Vedas C एक मध्यमवर्गीय भाषा हैं अर्थात यंत्र के संबंंधित भाषा को उच्चतम भाषा में बदल सकते हैं यही सी का मुख्य उद्देश्य है  वेद में कैसे सी भाषा हो सकता हैं? अब खुद के मन में विचार आये होगा आखिर कार वेद में ऐसा क्या है? इसका उत्तर निकालने हेतु हम इसे ही तीन भागों में बढ़ देंगे। १) भाषाज्ञान  २) व्याकरण ज्ञान ३) वेद ज्ञान भाषा ज्ञान समझने हेतु एक व्याकरण उससे ही भाषा का नियम वा syntax कहते हैं अब  आप के प्रश्न हो सकता है संस्कृत भाषा ही क्यों संस्कृत भाषा में एक द्वि तथा तीन पद होता हैं इसके एक भाषा के आधार तथा दत्त  सामग्री को data कहते हैं पहले यांत्रिक भाषा में द्विसंख्यात्मक अर्थात binary अंक निर्देशित करते हैं दुसरा अक्षरात्मक हैं इसे लोप आगम वा आदेश के अनुसार मानते हैं इसमें अक्षर का उत्पत्ति संधान ही मूल हैं लेकिन संख्या नियम में एक ही क्रिया को कही बार दौरान एक विधि नियम है यही उसकी मूल हैं ऐसा करने का कार्य को कंप्यूटर में  loop कहते हैं ये हो गया भाषा विज्ञान इसे पहले नियमक रूप मानते हैं इसके कारण एकान्तिक वा अनेकान्तिक निर्देशित क्रिया ...

क्या वेद में दयनोसर हैं?

संदीप आर्य नाम एक दुष्ट समाजी वेद में दयनोसर बोल रहा हैं ये यथावत ग़लत है इस मुर्ख ये तक पता नहीं मंत्र जो दिया गया हैं वो भगवान शिव केलिए समर्पित किया गया हैं नीचे इसका खण्डन किया गया हैं ये वृक्षेषु शष्पिञ्जर निलग्रीवा विलोहिताः तेषां ँ सहस्र योजने ऽव धन्वानि तन्मसि यजुर्वेद १६:५८ ये वृक्षेषु आश्रितः अतः वट अश्वतादि विलक्षणः भाव अधिगतम वृक्षं इति तेषु आश्रितः शष्पिञ्जर शष्पं बालतृणं तद् पिञ्जर च हरितवर्णाः च विगतं काश्चन् निलग्रीवा निलं च यद् ग्रिवा यं तान् रुदान् इति भावः तेषु केचन विशेषं लोहितः अतः तेषु काश्चन् रक्तवर्णाः यद्वा विगतं रुधिरं येषां ते लोहितपदं मांसादिनामुपलक्षणम् विगतो लोहितादिधातवस्तेजोमयशरीराः इत्यर्थ तेषां इति उक्तं तेषां सहस्र योजने अतः सहस्रयो जनरहित मार्गे वयमवतन्मसि अवतन्मः अवतारयाम तं धन्वानि धनूंपि दूरं क्षिपामि इत्यार्थः अत्र मन्त्रभिः दुरं कर्तुम इति कर्मणाद्भवः हिन्दी : अश्वतादि विलक्षणों से उत्पन्न होने वाले वृक्षों को आश्रय लेने वाले बाल तृणों के सामन एव हरित रंग वाले और कुछ जो नील ग्रीव वाले एवं मांस और शोणि रहित रुद्रों (भूत गण) जो होतें हैं एवं जो ते...

क्या मनुस्मृति का ४/१२३/१२४

न तो ये श्लोक प्रक्षिप्त हैं न तो गलत है आर्य समाजी इन्हें समझने के बुद्धि नहीं होता है यहां कर्मणा विशेष भाव को अभिव्यक्त किया गया हैं सीधे बात ज्ञान संबंधित मंत्र से हवन नहीं होता हैं पितृसुक्त वा उनके संबंधित मंत्रों से देव हवन वा उपासना नहीं होता हैं । सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदा चन । वेदस्याधीत्य वाप्यन्तं आरण्यकं अधीत्य च ४/१२३ सामवेद के शैली में कभी यजुर्वेद ऋग्वेद नहीं पढ़ना चाहिए क्यों कि यजुर्वेद गद्यात्मक हैं ऋग्वेद पद्यात्मक हैं इसलिए इनमें स्वर रहित हैं ।इसलिए स्वर लगायें बिना साम शैली उत्पन्न नहीं होता हैं आरण्यक उपनिषद पढ़कर हवन न करें इनमें ज्ञान बोधन होने से इनमें कर्म रहित हैं इसलिए इनसे अधययन से हवन नहीं होता हैं । ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः । सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ४/१२४ ऋग्वेद देवता संबंधित होता हैं यजुर्वेद मनुष्य संबंधित हैं सामवेद पितृसंबधित हैं इसलिए इनका ध्वनि शोक का व्यक्त करता हैं अतः इनका ध्वनि खेद को प्रकट करते हैं। यहां पढ़ने की बात पढ़ने लिखने की नहीं हो रहा हैं अपितु कर्म बोधक में लिया गया हैं इसलिए यहां केवल उस उ...

आदि शंकराचार्य नारी नरक का द्वार किस संदर्भ में कहा हैं?

कुछ लोग जगद्गुरू आदि शंकराचार्य जी पर अक्षेप करते हैं उन्होंने नारि को नरक का द्वार कहा हैं वास्तव में नारी को उन्होंने नारी को नरक के द्वार नहीं कहते परन्तु यहां इसके अर्...

वैशेषिक में ज्ञान विज्ञान

वैशेषिक ग्रंथ के अनुसार पदार्थ क्या हैं? जो जानने केलिए योग्य या उपयोग करने में योग्य अर्थात भौतिक विश्लेषण का परम प्रादुर्भाव को पदार्थ कहा हैं और उपाधि द्वारा इसका प्र...